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तृष्णा (कविता )

Posted On: 5 Jul, 2014 Others,कविता,Hindi Sahitya में

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अकेलेपन की मुझको आदत नहीं
पर अकेले रहना बन गई है फ़ितरत मेरी

भीड़ से बचने की चाहत नहीं
पर तन्हाईयाँ मुझको भाने लगी हैं

रिश्तों की जिंदगी में कमी नहीं
पर सबका प्यार मेरे नसीब में नहीं

खुशियाँ तो बहुत मिली जिंदगी में
पर गम भी मुझसे जुदा नहीं

हर ख्वाहिश को मंजिल मिली
पर अधूरी तमन्नाओं की कमी नहीं

पूरी हुई है हर ख्वाहिश
पर मन की तृष्णा बुझी नहीं

जिंदगी में दोस्त तो अनगिनत मिले
पर नकाबपोश दुश्मनों की भी कमी नहीं

लुभाती है जिंदगी की रंगीनियां
पर श्वेत-श्याम ही बन गई है मेरी संगिनियां

हसीन लगती है अपनी सपनों की दुनिया
पर मेरी दुनियावालों क अपना एक जहाँ है

रास्ते की मुश्किलों को पार कर खुश होता है मन मेरा
पर दुविधाओं से बचने को चाहता है दिल मेरा



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6 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadguruji के द्वारा
July 6, 2014

रास्ते की मुश्किलों को पार कर खुश होता है मन मेरा पर दुविधाओं से बचने को चाहता है दिल मेरा.बहुत भावपूर्ण और मन को छूटी हुई रचना ! बहुत बहुत बधाई !

PAPI HARISHCHANDRA के द्वारा
July 7, 2014

वंदना जी सटीक टाईटिल पर सटीक कविता ओम शांति शांति शांति 

deepak pande के द्वारा
July 7, 2014

SUNDER ABHIVYAKTI AUR AAJ KEE SACHCHAI PARANTU MAFI CHAHUNGA KUCHH NAKARATMAK HO GAYEE ISE ANT ME KUCHH SAKARATMAK POOP DEEJIYE AADARNIYA वंदना JEE

vandana singh के द्वारा
July 8, 2014

धन्यवाद HARISHCHANDRA ji

vandana singh के द्वारा
July 8, 2014

धन्यवाद सद्गुरु जी

vandana singh के द्वारा
July 8, 2014

धन्यवाद दीपक जी,आप जिसे नकारात्मक कह रहे है वह जिंदगी की हकीकत है


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